फर्जी कॉल और आंकड़ों के सहारे चल रहा था संचालन: बस्ती में 108 और 102 एंबुलेंस सेवाओं पर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया, डीएम से उच्च स्तरीय जांच की मांग।
जिला प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जांच कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी या फिर इस फर्जीवाड़े के पीछे छिपे बड़े चेहरों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सचमुच गाज गिरेगी?
अजीत मिश्रा (खोजी)
फर्जी कॉलों के साए में जिंदगी और मौत: बस्ती की 108 और 102 एंबुलेंस सेवाओं पर उठे गंभीर सवाल
- कागजों पर दौड़ती एंबुलेंस, हकीकत में तड़पते मरीज: महदी निवासी सुशील पांडेय ने जिलाधिकारी को सौंपा ज्ञापन, पिछले 5-6 महीनों के रिकॉर्ड की जांच की गुहार।
- जिंदगी और मौत से खिलواड़ बर्दाश्त नहीं: डीएम बस्ती ने दिए 108-102 एंबुलेंस सेवाओं के रिकॉर्ड मिलान और निष्पक्ष जांच के आदेश, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी।
बस्ती जिले में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं का दावा करने वाली 108 और 102 एंबुलेंस सेवाएं अब खुद ही गंभीर बीमारियों की शिकार नजर आ रही हैं। सड़क पर तड़पते घायलों और अस्पताल की आस लगाए बैठे मरीजों को समय पर मदद मिले या न मिले, लेकिन कागजों पर सरकारी तिजोरी से धन निकालने का खेल पूरी रफ्तार से चल रहा है। हर्रैया तहसील के महदी निवासी सुशील पांडेय द्वारा जिलाधिकारी को सौंपा गया ज्ञापन इस व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है, जिसमें कंपनी पर फर्जी मरीज, फर्जी कॉल और मनगढ़ंत रिकॉर्ड तैयार करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
कागजी घोड़ों पर दौड़ती एंबुलेंस, हकीकत में घंटों का इंतजार
यह बेहद चिंताजनक और अमानवीय स्थिति है कि एक तरफ जहां कागजों में एंबुलेंस का संचालन शत-प्रतिशत दिखाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सड़क हादसों और आपात स्थितियों में फंसे लोग समय पर मदद न मिलने के कारण बेबस नजर आते हैं। एंबुलेंस के आने का इंतजार करते-करते कई बार मरीज दम तोड़ने की कगार पर पहुंच जाते हैं। यदि जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाली जीवनरक्षक सेवाएं ही फर्जी आंकड़ों के सहारे केवल ‘लक्ष्य पूरा करने’ का जरिया बन जाएं, तो इसे व्यवस्था की नाकामी नहीं बल्कि एक संगठित लूट कहा जाना चाहिए।
निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की दरकार
शिकायतकर्ता ने पिछले 5-6 महीनों के डिजिटल वॉयस रिकॉर्डिंग (DVR), पेशेंट कॉल रिकॉर्ड (PCR) और एंबुलेंस के लॉग्स को अस्पतालों के आधिकारिक एडमिशन रजिस्टर से मिलान करने की मांग की है। यह एक सटीक और पारदर्शी पैमाना है, जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है।
गनीमत है कि जिला प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जांच कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी या फिर इस फर्जीवाड़े के पीछे छिपे बड़े चेहरों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सचमुच गाज गिरेगी?
जनता की जिंदगी से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं
स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग और आम जनता की जिंदगी के साथ ऐसा खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि जांच में एंबुलेंस प्रदाता कंपनी दोषी पाई जाती है, तो केवल औपचारिकता के तहत जुर्माना लगाकर मामला रफा-दफा नहीं किया जाना चाहिए। कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के साथ-साथ इसमें संलिप्त हर एक भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी के खिलाफ कड़ी से कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी जीवनरक्षक सेवाओं को कमाई का धंधा बनाने की हिम्मत न जुटा सके।
















